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पितृदोष

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वर्तमान समय में हर व्यक्ति किसी न किसी परेशानी से झुंझ रहा है, चाहे वह शारीरिक, मानसिक, व्यापारिक, व्यावसायिक हो या आर्थिक हो । परेशानी तो परेशानी होती है इन परेशानियों में व्यक्ति टूट सा जाता है उस समय सभी सगे संबन्धी भी साथ छोड़ देते है बस कोई साथ देता है तो वह है उस व्यक्ति का आत्मबल ।

यह आत्मबल उत्पन्न होता है उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति और उसके आराध्य के आशीर्वाद से जो की उसके द्वारा किये गए पुण्य कर्मो व पितृओं की कृपा से ।

हमारी संस्कृति में हमारे पूर्वजों को देव तुल्य मान कर उन्हें पितृओं कि संज्ञा दी गई है क्योकिं वे ही हमारे जन्म के कारक है, उन्ही के वंश में हमारा जन्म हुआ ज्योतिषीय गणना में भी भगवान सूर्य को को पिता माना गया है । उन्ही की स्थिति से हमारी पत्रिका में पितृ दोष को स्थिति देखी जाती है ।

पितृ दोष क्यों होता है – मुख्य रूप से पितृ दोष का निर्माण राहु, केतु, मंगल, शनि, बृहस्पति, व सूर्य की स्थिति देख कर पता लगता है । जिन कुंडलियों में शनि-राहु, शनि-केतु, शनि-मंगल, गुरु-राहु, राहु-चन्द्र, सूर्य-शनि, सूर्य-केतु, राहु-सूर्य,की युतियां बन रही है विशेष रूप से ये पितृ दोष को प्रदर्शित करता है ।

इनसे हमारे जीवन में कई विघ्न आते है जैसे-परिवार में कलह, व्यापर में घाटा, आय से अधिक खर्च, शत्रुओं का बढ़ना, कोर्ट के चक्कर काटना, असाध्य रोग, मांगलिक कार्य में विलम्ब, बुरे सपने आना, सर्प या भयानक आकृतियों का आभास होना, आत्म विश्वास में कमी, वंश की वृद्धि ना होना इत्यादि । किन्तु हमारे शास्त्र में इस समस्या का एक हि उपाय है पितृ-पूजन । जिसमे पितृओ के लिए तर्पण, पिण्ड-दान, नागवली-नारायण वली कर्म, श्राद्ध, धुप, व ब्राह्मण भोजन प्रमुख है ।

हमारे शास्त्रों में बताया गया है कि मनुष्य मृत्यु के उपरांत 84 लाख योनियों में विचरण कर पुनः मानव रूप में जन्म लेता है इन योनियों में विचरण करते हुए वह असहाय होकर अपनी संतति से विभिन्न प्रकार की आशा व तृष्णा रखता है ये आशाऐं पूर्ण ना होने पर वह अत्यंत निराश होते है और वह निराशा ही हमारे जीवन में विघ्न के रूप में उत्पन्न होती है ।

वर्तमान समय में भौतिकता कि सोच रखकर कितने ही लोग इस सत्य को नहीं मानते किन्तु शास्त्र के प्रमाण यह सिद्ध करते है कि पितृओं का अस्तित्व होता है और उनके निमित्त हम जो जल का दान करते है, पिंड का दान करते है वे उसे सूक्ष्म वायु के रूप में ग्रहण कर तृप्त होते है ।

शास्त्र में 72 पीढ़ियों के पितृओ के लिए तर्पण का विधान है क्योंकि जब हम तर्पण करते है  तो सूर्य किरणे उस जल को ग्रहण करती है और वायु के रूप में उन तक पहुँचाती है ।

साथ ही पितृ पूजन से मनुष्य को तीन प्रकार के ऋणों से भी मुक्ति मिलती है ।

तर्पणन्तु शुचिः कुर्यात् प्रत्यंह स्नात कोद्विजः ।

देवेभ्यश्च, ऋविभ्यश्च, पितृभ्यश्च यथा क्रमम् ॥ 

तर्पण करने से देवगण, ऋषिगण व पितृगण तृप्त होकर, तर्पण करने वाले मनुष्य का कल्याण करते है ।

वैसे तो प्रतिवर्ष अपने ज्ञात पितृओ कि तिथी पर पितृ कर्म व श्राद्ध अवश्य करना चाहिए किन्तु यदि किसी तिथि ज्ञात न हो तो चतुर्दशी, व अमावस्या पर समस्त पितृओ का आवाहन कर मध्यान समय में परिवार के सभी लोगों कि उपस्थिति में पूर्ण श्रद्धा के साथ तीर्थ पर जाकर अपने कुल के पुरोहितों द्वारा यह कर्म करना चाहिए ।

तब भी सम्भव न हो तो आश्विन मास का पितृपक्ष, उस समय हमारे पितृ पृथ्वी के करीब होते है । इसलिए कनागत के 16 दिन पितृदोष के मुक्ति के लिये सर्वश्रेष्ठ कहें गए है जिससे हमारे पितृ तृप्त होकर हमें आशीर्वाद देते है और हमारी सभी समस्याओं का निवारण करते है ।

अवंतिका में पितृ दोष का पूजन पूर्ण वैदिक परम्परानुसार किया जाता है त्रेतायुग में भगवान श्री रामचन्द्र ने रामघाट पर तथा द्वापर में श्री कृष्ण ने सांदीपनि ऋषि के पुत्रों का पिंडदान गया मोक्ष तीर्थ पर किया था अति प्राचीन प्रेतशीला तीर्थ जो सिद्धवट पर है वहाँ पर भी सिद्धनाथ का पूजन कर पितृदोष का निवारण सम्भव है इस कर्म में पितृ तर्पण, पिण्डदान, नागवली-नारायण वली कर्म, प्रेत सूक्त पाठ व ब्राह्मण भोजन प्रमुख है ।